हिंदू धर्म में त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—को सृष्टि के सबसे प्रमुख देवता माना जाता है। इनमें से ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा गया है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि पूरे विश्व में ब्रह्मा जी का केवल एक ही मंदिर है, और वह पुष्कर में स्थित है। यह क्यों? इसका उत्तर छिपा है एक रोचक पौराणिक कथा में, जिसमें माता सावित्री के श्राप की गूंज आज भी सुनाई देती है।
त्रिदेवों में विशेष होते हुए भी ब्रह्मा जी की पूजा वर्जित क्यों है?
ब्रह्मा जी ने संसार की रचना की, वे चार वेदों के ज्ञाता माने जाते हैं। लेकिन उनके नाम का ना घरों में पूजन होता है, ना मंदिरों में आरती। यह विरोधाभास तभी समझ आता है जब हम पौराणिक कथाओं की ओर रुख करते हैं, जिसमें एक स्त्री का अपमान, समय की चूक, और देवता का निर्णय एक बड़ी सज़ा का कारण बनते हैं।
कमल से जन्मा पुष्कर और ब्रह्मा जी की यज्ञ-स्थली
कहा जाता है कि ब्रह्मा जी अपने वाहन हंस पर सवार होकर यज्ञ के लिए स्थान खोज रहे थे। उनके हाथ से गिरा एक कमल पुष्प जब पृथ्वी पर गिरा, तो वहाँ एक जलधारा फूट पड़ी, जिससे तीन पवित्र सरोवर बने—ब्रह्म पुष्कर, विष्णु पुष्कर और शिव पुष्कर। यह देखकर उन्होंने तय किया कि वे यहीं यज्ञ करेंगे।
यज्ञ के लिए पत्नी का होना जरूरी था—और यही बना कारण एक नई कथा का
यज्ञ बिना पत्नी के अधूरा माना जाता है। लेकिन जब शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था, तब सावित्री देवी उपस्थित नहीं थीं। समय व्यर्थ न जाए, इसलिए ब्रह्मा जी ने वहीं मौजूद एक सुंदर कन्या से विवाह कर यज्ञ शुरू कर दिया। यही निर्णय भविष्य में उन्हें बहुत महंगा पड़ा।
माता सावित्री का क्रोध और दिया गया श्राप
जब सावित्री देवी को इस विवाह की बात पता चली, तो उनका क्रोध भड़क उठा। उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दे दिया—“तुम्हारी पूजा अब केवल पुष्कर में ही होगी, और कहीं नहीं”। यह श्राप इतना प्रभावशाली था कि आज भी ब्रह्मा जी के मंदिर बहुत ही दुर्लभ हैं।
श्राप की ताकत: एक देवता, लेकिन बिना आराधना के
इस श्राप के बाद से ही ब्रह्मा जी की पूजा करना वर्जित हो गया। वह देवता जिसने सृष्टि बनाई, उसी की पूजा नहीं होती! यह परंपरा केवल धर्म से नहीं, बल्कि भावनाओं और न्याय की गहराई से जुड़ी हुई है।
पुष्कर में आज भी श्रद्धा से होती है पूजा—पर दूर से
राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित पुष्कर में आज भी ब्रह्मा जी का भव्य मंदिर है। परंपरा के अनुसार भक्त केवल दूर से ही दर्शन करते हैं, पास जाकर पूजा या अभिषेक नहीं करते। मंदिर का निर्माण प्राचीन है, और इसकी आभा आज भी श्रद्धालुओं को खींच लाती है।
पद्म पुराण में वर्णित कथा: दस हजार वर्षों की तपस्या
पद्म पुराण के अनुसार, ब्रह्मा जी ने पुष्कर में दस हजार वर्षों तक तपस्या की और पांच दिनों तक यज्ञ किया। यज्ञ के अंत में सावित्री देवी पहुँचीं, लेकिन तब तक वह श्राप अमिट हो चुका था।
माता सावित्री की तपस्या: पहाड़ियों पर बसा दूसरा मंदिर
श्राप के बाद सावित्री देवी पुष्कर की पहाड़ियों में चली गईं और वहीं कठोर तपस्या की। आज वही स्थान “सावित्री माता मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध है। वहां से पुष्कर झील और मंदिर का दृश्य अत्यंत मनमोहक लगता है।
पुष्कर की पवित्रता और धार्मिक पर्यटन
पुष्कर आज भारत का एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल है। यहां हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं, पुष्कर मेला, कार्तिक स्नान और दीपमालिका जैसे पर्व यहां की पहचान हैं। साथ ही ऊंट मेले और लोकसंस्कृति से जुड़े आयोजन भी होते हैं।
इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है?
यह कथा हमें सिखाती है कि समय, सम्मान और निर्णय कितने महत्वपूर्ण होते हैं। एक गलत निर्णय ने ब्रह्मा जी जैसे देवता की पूजा को सीमित कर दिया। यह कहानी आज के समाज में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी प्राचीन युग में थी।
ब्रह्मा जी की पूजा न होना—श्राप या जीवन का संकेत?
क्या ये श्राप है या संकेत? यह विचार करने योग्य है। शायद यह कहानी हमें बताती है कि निर्माणकर्ता का आदर तभी तक होता है जब तक वह मर्यादा में रहे। ब्रह्मा जी का निर्णय दर्शाता है कि शक्ति के साथ विवेक भी जरूरी है।
निष्कर्ष
पुष्कर ना सिर्फ एक मंदिर है, बल्कि एक संदेश है—कि समय की उपेक्षा, रिश्तों का अपमान और अहंकार चाहे किसी के भी हों, परिणाम गहरे होते हैं। यह कथा सिखाती है कि श्रद्धा केवल शक्ति नहीं, भावना का भी नाम है।
0 Comments